गीतांजलि सोसायटी के फ्लैट खरीदार फिर जाएंगे हाईकोर्ट, बिल्डर और आवास विकास परिषद पर गंभीर आरोप

गीतांजलि सोसायटी के फ्लैट खरीदार फिर जाएंगे हाईकोर्ट, बिल्डर और आवास विकास परिषद पर गंभीर आरोप

गाजियाबाद गार्डेनिया गीतांजलि हाउसिंग प्रोजेक्ट से जुड़े सैकड़ों फ्लैट खरीदार एक बार फिर न्याय की गुहार लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाने जा रहे हैं। खरीदारों का आरोप है कि बिल्डर और आवास विकास परिषद की लापरवाही और अनियमितताओं के कारण वे कानूनी संकट में फंस गए हैं। यह सोसायटी गाजियाबाद शहर की वसुंधरा के सेक्टर 18 में प्राइम लोकेशन पर है।

सूत्रों के अनुसार, प्रोजेक्ट के निर्माण के लिए किए गए *हायर परचेज एग्रीमेंट* के तहत बिल्डर को भूमि आवंटन के बकाया भुगतान करना था, लेकिन बिल्डर ने इन देयों का भुगतान नहीं किया। आरोप है कि उत्तर प्रदेश आवास विकास परिषद ने भी समय रहते अपने अधिकारों का उपयोग कर वसूली नहीं की और इसके बावजूद बिल्डर को फ्लैट खरीदारों को कब्जा देने की अनुमति दे दी। वर्ष 2019 में सैकड़ों परिवारों को उनके फ्लैट्स का कब्जा सौंप दिया गया, जबकि भूमि से जुड़े वित्तीय विवाद लंबित थे।

स्थिति तब और गंभीर हो गई जब 3 मार्च 2025 को आवास विकास परिषद ने अचानक नीलामी की कार्यवाही शुरू करते हुए नोटिस जारी कर दिया। इससे उन खरीदारों में भारी असमंजस और भय का माहौल बन गया, जिन्होंने अपनी जीवन भर की पूंजी लगाकर ये घर खरीदे थे। यहां 1400 वर्गफुट से लेकर 2400 वर्गफुट के कुल 209 फ्लैट हैं जो तब 40 लाख से लेकर एक करोड़ रुपए में बिके थे जिसकी कीमती आज तीन गुनी हो चुकी है पर आवंटी दुर्भाग्यवश अब तक प्रॉपर्टी के कानूनी हकदार नहीं हैं।

खरीदारों का आरोप है कि बिल्डर ने न केवल उनका पैसा हड़प लिया, बल्कि भूमि का बकाया चुकाए बिना ही परियोजना छोड़ दी। आवास विकास परिषद जमीन के लिए आज ब्याज समेत 200 मांग रही है और बिल्डर दे नहीं रहा है। इतना ही नहीं, बिल्डर पर यह भी आरोप है कि उसने अपनी ओर से अवैध रजिस्ट्री कराकर खरीदारों को ऐसे संपत्ति हस्तांतरण दिए, जिन पर उसका वैध स्वामित्व ही नहीं था। इससे खरीदारों को कानूनी अनिश्चितता और विवादों के जाल में धकेल दिया गया है।

इस पूरे मामले को लेकर गीतांजलि फ्लैट बायर्स एसोसिएशन पहले भी हाईकोर्ट पहुंची थी। उस समय न्यायालय ने आवास विकास परिषद को निर्देश दिया था कि वह खरीदारों की आपत्तियों पर सुप्रीम कोर्ट के महत्वपूर्ण फैसलों—जैसे *बिक्रम चटर्जी केस* और *लोटस 360 केस*—तथा अमिताभ कांत समिति की सिफारिशों के अनुरूप निर्णय ले। इन निर्णयों में स्पष्ट किया गया था कि यदि बिल्डर भूमि का भुगतान करने में विफल रहता है और प्राधिकरण समय पर कार्रवाई नहीं करता, तो निर्दोष खरीदारों पर वसूली का बोझ नहीं डाला जा सकता। साथ ही यह भी कहा गया था कि वसूली की कार्रवाई बिल्डर के खिलाफ होनी चाहिए, न कि खरीदारों के खिलाफ।

हालांकि, खरीदारों का कहना है कि आवास विकास परिषद ने उनकी आपत्तियों को *नॉन-स्पीकिंग ऑर्डर* के जरिए खारिज कर दिया, जिसमें उनके पक्ष पर कोई ठोस या तर्कसंगत विचार नहीं किया गया।

अब निराश और आक्रोशित खरीदार एक बार फिर इलाहाबाद हाईकोर्ट का रुख कर रहे हैं। इस बार वे आवास विकास परिषद के आदेश को चुनौती देने के साथ ही बिल्डर द्वारा की गई कथित अवैध रजिस्ट्रियों को भी मुद्दा बनाएंगे।

इस पूरे घटनाक्रम ने न केवल खरीदारों के भविष्य को अनिश्चित बना दिया है, बल्कि रियल एस्टेट सेक्टर में नियामकीय जवाबदेही और पारदर्शिता पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

Delhi NCR