जनपद बस्ती में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के दौरान सामने आए एक संदिग्ध फर्जीवाड़े ने प्रशासनिक व्यवस्था और चुनावी पारदर्शिता पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े कर दिए हैं। जांच में यह तथ्य सामने आया है कि कुछ व्यक्तियों के नामों में मामूली अंतर, पिता के नाम की समानता, अलग-अलग पहचान संख्या तथा मकान संख्या में बदलाव कर एक ही व्यक्ति के नाम से अलग-अलग स्थानों पर प्रविष्टियां दर्ज की गई हैं। 
प्राप्त विवरण के अनुसार अखिलेश शुक्ला/चन्द्र शेखर (पहचान संख्या ZDD1552280) का नाम क्रमांक 260 पर, मकान संख्या “नया”, आयु 45 वर्ष, ग्राम जामडीह, बस्ती सदर में दर्ज है। वहीं इसी से मिलते-जुलते नाम अखिलेश कुमार/चंद्रशेखर (पहचान संख्या UP/34/166/402055) का नाम क्रमांक 199 पर, मकान संख्या 29, आयु 60 वर्ष, ग्राम तिलकपुर, विकास खंड कप्तानगंज में दर्ज पाया गया है। इसी प्रकार महेश कुमार शुक्ला/चंद्रशेखर शुक्ल (पहचान संख्या ZDD1552256) का नाम क्रमांक 267 पर, मकान संख्या “नया”, ग्राम जामडीह, बस्ती सदर में दर्ज है, जबकि महेश कुमार/चन्दशेखर (पहचान संख्या JHQ3426541) का नाम क्रमांक 204 पर, मकान संख्या 29, आयु 41 वर्ष, ग्राम तिलकपुर, कप्तानगंज में दर्ज दिखाया गया है।
नामों में मामूली अंतर, पिता के नाम की समानता और एक ही मकान संख्या का बार-बार उपयोग यह संकेत देता है कि यह महज़ लिपिकीय त्रुटि न होकर सुनियोजित गड़बड़ी भी हो सकती है। इस मामले ने उस समय और गंभीर रूप ले लिया जब स्थानीय लोगों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने सवाल उठाया कि इन प्रविष्टियों से जुड़े दोनों व्यक्ति बस्ती भाजपा जिला अध्यक्ष विवेकानन्द मिश्रा के फुफेरे भाई बताए जा रहे हैं, जो सरकारी कर्मचारी भी हैं। हालांकि इस संबंध में अभी तक कोई आधिकारिक पुष्टि या पक्ष सामने नहीं आया है, लेकिन आरोपों ने राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में हलचल पैदा कर दी है।
कानूनी जानकारों के अनुसार यदि एक ही व्यक्ति का नाम दो अलग-अलग स्थानों पर मतदाता सूची में दर्ज पाया जाता है और यह जानबूझकर किया गया सिद्ध होता है, तो यह जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 17 का सीधा उल्लंघन है, जिसमें एक से अधिक निर्वाचन क्षेत्रों में पंजीकरण पर रोक है। इसके साथ ही धारा 31 के तहत झूठी घोषणा या गलत जानकारी देने पर एक वर्ष तक का कारावास या जुर्माना या दोनों का प्रावधान है। यदि दस्तावेज़ों में जालसाजी या धोखाधड़ी सिद्ध होती है, तो भारतीय दंड संहिता की धारा 420 (धोखाधड़ी – अधिकतम 7 वर्ष की सजा), धारा 468 (जालसाजी – 7 वर्ष तक का कारावास) और धारा 471 (जाली दस्तावेज़ का उपयोग – मूल अपराध के समान सजा) के तहत भी कार्रवाई हो सकती है। वहीं, सरकारी कर्मचारी की संलिप्तता पाए जाने पर विभागीय कार्रवाई के साथ निलंबन और सेवा से बर्खास्तगी तक का प्रावधान भी लागू हो सकता है।
स्थानीय लोगों का सवाल है कि जब SIR का उद्देश्य ही फर्जी और त्रुटिपूर्ण नामों को हटाना है, तो इतनी स्पष्ट विसंगतियां कैसे नज़रअंदाज़ की गईं। उन्होंने BLO, सुपरवाइजर और संबंधित निर्वाचन अधिकारियों की भूमिका की भी जांच की मांग की है। सामाजिक संगठनों का कहना है कि यदि आम नागरिक के मामले में तुरंत कार्रवाई होती है, तो प्रभावशाली लोगों से जुड़े मामलों में देरी क्यों?
फिलहाल चुनाव प्रशासन और भाजपा जिला अध्यक्ष विवेकानन्द मिश्रा की ओर से इस पूरे प्रकरण पर कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है, लेकिन मामला अब केवल आरोपों तक सीमित न रहकर कानूनी कार्रवाई, जवाबदेही और दंड के प्रावधानों तक पहुंच चुका है। जनपद में इस प्रकरण को लेकर निष्पक्ष और उच्चस्तरीय जांच की मांग तेज़ होती जा रही है।
